मोरु एक पहेली



मोरु को देख कर लगता था कि गंगा के इस पार या उस पार वाला मुहावरा उस के लिये लिखा गया था| उसकी पसंद या नापसंदगी बड़ी जबरदस्त थी| जो काम वह नहीं करना चाहता वह् कोई भी उससे करवा नहीं सकता था और नाही कोई उसे अपने मन का काम करने से रोक सकता था| मोरु एक पहेली जैसा था|



पेड़ों पर चढ़कर कच्चे आम तोड़ना मोरु को अच्छा लगता था| वह टहनियों पर रेंगते हुए ऐसी कल्पना करता मानो किसी घने जंगल में चीता हो| उसे कीड़े पकड़ना भी पसंद था| चमकदार पन्नी सी चमचमाते सर वाली हरि-नीली घोड़ा मक्खी, पतला और चर्चरा सा टेड्डा, पीली तितली जिसका रंग पीले गुलाल सा उसकी उँगलियों पर उतर आता था| मोरु को पतंग उड़ाना भी अच्छा लगता था| जितनी ऊँची उड़ सके उतना अच्छा| सबसे ऊँची छतों पर चढ़ कर वह अपनी पतंग बादलों से कहीं ऊपर तक उड़ाता जैसे वह एक चमकता हुआ पक्षी हो जो सूरज तक पहुँचने की कोशिश कर रहा हो|



मोरु को अंक अच्छे लगते थे| 1 का अंक उसे दुबला और अकेला सा लगता था तो 100 मोटा और अमीर सा| 9 कितना अकहरा और आकर्षक लगता ख़ास तौर पर वह जब 1 के बगल में खड़ा हो कर 19 बन जाता| अंक उसे कभी न खत्म होने वाली सीढ़ी जैसे लगते| मोरु कल्पना करता कि वह एक-एक कर के सीढ़ी चढ़ रहा है|



कभी-कभी तेज़ी से दो, कभी-कभी तीन-चार सीढ़ी एक साथ चढ़ जा रहा है| जब वह थक जाता तो ख़ुद को सीढ़ियों के जंगले पर फिसलते हुए देखता और सब अंक उसकी ओर हाथ हिला रहे होते| दोपहर के खाने में अकसर सबके आधे पेट रह जाने पर खत्म हो जाने वाले चावल से नहीं, उन दोस्तों से नहीं जिन्हें खेल जमते ही घर जाना होता, अंक हमेशा मोरु के पास रहते| कभी न खत्म होने वाले अंक कि जब चाहे उनके साथ बाज़ीगरी करो, छाँटो, मिलाओ, बाँटो, एक पंक्ति में लगाओ, फेंको, एक साथ मिलाओ या अलग कर दो|



मोरु को स्कूल जाना अच्छा लगता क्योंकि उसके कई दोस्त भी स्कूल जाते थे| सवेरे उठ कर बाहर जाना उसे अच्छा लगता था| स्कूल के अहाते के अन्दर खेल का मैदान उसे अच्छा लगता था| पर उसे कक्षा में जाना अच्छा नहीं लगता था| उसे शिक्षक अच्छे नहीं लगते थे| कक्षा में वह अपने को कैद महसूस करता था| वहाँ कई चीजें करने की मनाही थी| बच्चे सवाल नहीं पूछ सकते थे, वे इधर-उधर घूम नहीं सकते थे और बोल भी नहीं सकते थे| शिक्षक के तेवर चढ़े रहते थे| मोरु को लगता था कि शिक्षक को बच्चे बिलकुल अच्छे नहीं लगते थे| शायद उन्हें शिक्षक होना भी पसंद नहीं था और स्कूल आना भी अच्छा नहीं लगता था| यूँ बच्चे भी शिक्षक को पसंद नहीं करते थे|



रोज़ सुबह शिक्षक बोर्ड पर कुछ लिख देते थे| उसके बाद ऊँची आवाज़ में सब बच्चों को अपनी स्लेटों पर उसे उतारने का आदेश देते| फिर वह बाहर चले जाते| अगर लड़के बोर्ड पर लिखी चीजों कि नकल अच्छे से करते तो वह उन पर नज़र डाल लेते| अगर वह ऐसा नहीं कर पाते तो वह नाराज़ हो जाते| जब वह गुस्से में होते तो बच्चों को बूरा भला कहते| और जब गुस्सा और बढ़ जाता तो वह उन्हें मारते थे|



एक दिन शिक्षक ने कुछ सवाल बोर्ड पर लिखे| सवाल आसान थे पर उबाऊ थे| बड़े सारे और सब एक जैसे| मोरु ने सवाल नहीं किए| उसका सवाल करने का मन नहीं कर रहा था और उसके पास स्लेट भी नहीं थी| उसकी स्लेट टूट गई थी और उसकी माँ के पास नई स्लेट खरीदने के पैसे नहीं थे| मोरु ने दीवार पर चढ़ने वाली सैकड़ों चींटियाँ गिनना शुरू किया| उसने बाहर पेड़ को देखा और उसे उसकी पत्तियाँ बिलकुल सही लगीं| सही पत्तियों की परछाईं भी सही होती है| मन ही मन मोरु ने स्कूल के अहाते की दीवार में टूटी ईंटों कि संख्या गिनी| उसने हिसाब लगाया कि अगर हर ईंट की कीमत पाँच रुपये है तो सारे छेद भरने में एक हज़ार से ज्यादा रुपये लगेंगे|



“मोरु!” शिक्षक ने कड़क के कहा, “तुम कुछ करते क्यों नहीं हो?” मोरु ने नासमझी से उनकी ओर टाँका| “तुम्हारी स्लेट कहाँ है? स्कूल ले कर नहीं आये क्या?” शिक्षक चिल्लाये| मोरु को दिख रहा था कि वे गुस्से में थे| “मेरी पुरानी स्लेट टूट गई और मेरे पास नई खरीदने के पैसे नहीं है|” मोरु बोला| शिक्षक गुस्से में थे और उन्होंने अपनी छड़ी से मोरु को पीटा| मोरु धीरे से बोला, “अगर स्लेट होती तो भी मैं सवाल नहीं करता क्योंकि मैं करना नहीं चाहता|” शिक्षक का गुस्सा सातवें आसमान पर पहुँच गया| उन्होंने मोरु के गाल पर एक तमाचा मारा| मोरु का गाल सुर्ख लाल हो गया| अचानक ही उसकी आँखों से गर्म आँसू फूट पड़े| वह खड़ा हुआ और कमरे से बाहर भागा| बरामदे से नीचे उतर, धूल भरे मैदान को पार करके वह टूटे फाटक से सीधे बाहर निकल गया|



अगले दिन सुबह माँ ने उसे स्कूल के समय पर जगाया| पर मोरु नहीं उठा| वह पतली सी चारपाई पर कसके आँखें मूँदे पड़ा रहा| अगले दिन भी वही किस्सा था और उससे अगले दिन और उससे भी अगले दिन| कोई भी मोरु को वापस स्कूल आने के लिये मना नहीं पाया| एक हफ्ता गुज़रा और फिर एक महीना| मोरु अपने घर के बाहर दीवार पर बैठा रहता|



कभी-कभी घंटों तक वह फल-सब्ज़ी के बाज़ार में गायब रहता| छत पर जा कर वह अपनी पतंग उड़ाने की कोशिश करता पर आसमान खाली होता तो इसमें ज़रा भी मज़ा नहीं आता| माँ ने डाँटा, भाई ने चिढाया, दादी ने मिन्नत की, चाचा ने टॉफी का वादा किया और दोस्तों ने फुसलाया पर कोई भी मोरु को स्कूल लौटने के लिये तैयार नहीं कर पाया|



बरसात का मौसम आया और गर्मी कि छुट्टियों के बाद स्कूल खुला| सबने सोचा कि अब तक मोरु भूल-भाल गया होगा और सबके साथ वह स्कूल चला जायेगा| “नहीं!” उसने ज़ोर से कहा| ऐसे ही एक साल गुजर गया| सबने मोरु से कोई भी आशा रखनी छोड़ दी| शायद मोरु ने भी ऐसा ही किया| वह और बहुत कुछ करने लगा|

बाज़ार में जाकर वह सब्ज़ीवालों कि नाक में दम किये रहता| उसके जैसे और बच्चे जिन्होंने स्कूल छोड़ दिया था, उनके साथ उसने मिलकर गुट बना लिया जो कि स्कूल जाने वाले बच्चों को चिढ़ाता और सताता था| अपने दोस्तों की स्कूल की कॉपियों से पन्ने फाड़कर वह हवाई जहाज़ बनाता| अपनी छत पर जा कर वह राह चलते लोगों पर गुलेल से ढेले मारता|



पुराने शिक्षक चले गये| एक नये नौजवान शिक्षक उनकी जगह आये| एक दिन मोरु दीवार पर बैठा बच्चों को स्कूल जाते देख रहा था| अब उससे कोई नहीं पूछता था कि वह उनके साथ क्यों नहीं आता| बल्कि अब तो बच्चे उससे बचते थे क्योंकि वह डरते थे कि मोरु उन्हें परेशान करेगा| शिक्षक भी वहाँ से गुजर रहे थे| मोरु ने उन्हें देखा| उन्होंने मोरु को देखा| न कोई मुस्कराया और न किसी ने भवें सिकोड़ीं| अगले दिन उसी समय और उसी जगह मोरु दीवार से नीचे देख रहा था| शिक्षक ने ऊपर देखा और हल्के से मुस्कुराये| मोरु झट दीवार से नीचे कूद कर भाग गया|



कुछ दिनों बाद शिक्षक फिर वहाँ से जा रहे थे| वह एक बहुत बड़ा थैला उठाये हुए थे| थैला बहुत भारी था| शिक्षक काफ़ी मुश्किल में थे| मोरु ने सर खुजलाया| शिक्षक धीरे-धीरे वहाँ से निकले| मोरु ने कुछ सोचा और फिर शिक्षक के पीछे भाग| बिना कुछ बोले उसने थैले को एक तरफ़ से थामा| शिक्षक को कुछ राहत मिली और दोनों मिल कर उस भारी भोज को स्कूल तक ले गए|



स्कूल के अन्दर थैले को संभाल कर शिक्षक की मेज़ पर रखा गया| शिक्षक ने थैला खोला और मोरु को अन्दर देखने दिया| उसमें बहुत सी रंग-बिरंगी हर आकर की किताबें थीं| चमचमाती और नये काग़ज़ की महक वाली| “क्या तुम इन्हें बाहर निकालने में मेरी मदद करोगे?” शिक्षक ने पूछा| मोरु ने किताबें बाहर निकालना शुरू किया| कुछ कहानियों की किताबें थीं जिनके आवरण पर तस्वीरें बनी थीं| कुछ में बड़े अक्षर थे| कुछ में इतने शब्द थे कि मालूम होता था उन्हें पन्नों में दबा के बैठाया गया हो| मोरु रोमांचित हो उठा| उसने दो साल से किसी किताब को हाथ नहीं लगाया था|



अगले दिन मोरु ने स्कूल छूटने का इंतज़ार किया| जब सब बच्चे जा चुके थे और शिक्षक अकेले थे, मोरु चुपचाप अन्दर आया और दरवाज़े पर आ कर खड़ा हो गया| शोरोगुल और हँसी मज़ाक के बगौर स्कूल कुछ भूतहा सा लग रहा था| शिक्षक ने नज़र उठाई और बोले, “अच्छा हुआ जो तुम आ गए| मुझे तुम्हारी मदद चाहिए|” मोरु को अचरज हुआ| शिक्षक क्या मदद चाहते होंगे? उनके पास तो मदद के लिये स्कूल में बहुत से बच्चे थे| वे धीरे से बोले, “क्या तुम किताबों को छाँटने में मेरी मदद कर सकते हो?”



मोरु ज़मीन पर बैठ गया| किताबें उसके चारों तरफ़ फैली थीं| इतनी सारी कहानी की किताबें थीं| उसने जानवरों की कहानियों वाली एक साथ रखीं| तेंदुए की कहानी हाथी ओट ऊंटों वाली कहानी के साथ ज़्यादा अच्छी रहेगी| परी कथाएँ देवी-देवताओं की कहानियों के साथ रह सकती हैं| रहस्य कथाएँ अकेली रहेंगी| या शायद उन्हें नायकों और मशहूर व्यक्तियों की कहानियों के साथ रखना चाहिए?



फिर आई अंकों वाली किताबें| मोरु की आँखें और उंगलियों की तेज़ी कुछ ढीली पड़ी| मोटे अंक पतले अंकों के साथ नाच रहे थे| दो अंक एक के ऊपर एक ऐसे बैठ गये जैसे कोई ढुलमुल इमारत हो जो अपनी नींव भरने का इंतज़ार कर रही हो| गुणा के सवालों में जैसे संख्या बढ़ती जाती थी, वो कुछ नाटे और नीचे की तरफ़ चौड़ाते लग रहे थे| भाग इसका ठीक उलटा था| शुरुआत में बड़ी संख्या और अगर ध्यान से करते जाओ तो अन्त में लम्बी पतली आकर्षक पुँछ बन जाती थी| अगर भाग्यशाली हो तो अन्त में कुछ नहीं बचेगा| एक-एक कर के सारे अंक और उनके करतब मोरु के पास लौट आये|



अँधेरा हो चला था और स्कूल में बिजली नहीं थी| “अब तुम्हें घर जाना चाहिए मोरु, पर कल फिर आ सकते हो?” शिक्षक ने पूछा, “पर क्या उस समय आओगे जब बच्चे यहाँ हो?” अगले दिन स्कूल शुरू होने के कुछ देर बाद मोरु आया| बच्चे उसे देख कर हैरान थे और कुछ डरे भी| अब तक मोरु का मोहल्ले के अकडू दादाअों में शुमार होने लगा था| “अब मेरी मदद करने वाला कोई हैं,” शिक्षक ने कहा| उन्होंने मोरु को छोटे बच्चों के साथ लगाया| कुछ किताबें थी जिनमे बच्चों को लिखना था| वे बोले, “इन अंकों को आरोही और अवरोही क्रम में लगाने के लिए इन बच्चों की मदद करो|” छोटे बच्चे मोरु के आसपास जमघट लगाने लगे| उन्हें आश्चर्य हो रहा था कि मोरु जैसे अक्खड़ को इतना कुछ आता था|”



मोरु ने उन्हें कतार में खड़ा करवाया – सबसे छोटे बच्चे एक छोर पर और लम्बे वाले दुसरे छोर पर| उसने उन्हें हाथों में अंक पकड़ाए| अब सब आसान हो गया| जैसे छोटे और लम्बे बच्चों के साथ हुआ कि किसे कहाँ खड़ा होना था वैसे ही अंकों के साथ करना था| रोज़ मोरु कुछ देर के लिये आता और शिक्षक उसे कुछ काम और फिर उससे बड़ा काम दे देते| रोज़ मोरु को लगने लगा कि उसका अंकों से लगाव बढ़ता ही जा रहा हैं और उसकी योग्यता और रोमांच छोटे बच्चों में भी समाते जा रहे हैं|



एक महीने बाद मोरु की माँ सुबह के दस-ग्यारह बजे उसे ढूँढ रही थीं| वह कहीं भी नहीं मिल रहा था| उन्होंने छत पर देखा पर उसकी पतंगे मायूस सी पानी की टंकी के पास पड़ीं थीं| उन्होंने दीवार पर झाँका जहाँ वह रोज़ टाँगें झूलाए बैठा रहता था पर दीवार खाली थीं| उन्होंने आम के पेड़ पर देखा जहाँ पत्तियाँ हवा में सरसरा रही थीं लेकिन किसी भी टहनी पर मोरु नहीं था| वह बाज़ार तक गई पर सभी सब्ज़ीवाले आराम से अपनी सब्ज़ियाँं बेच रहे थे| आज उन्हें सताने वाला लड़कों का गुट कहीँ नहीं था| अन्त में वह गली पार कर रही थीं तो उनकी नज़र अनायास ही स्कूल की खिड़की पर टिक गई|



वहाँ मोरु नज़र आ रहा था| वह सर झुकाये ध्यान से अपनी कॉपी में कुछ देख रहा था| उसके माथे पर सोच की रेखाएँ दिख रही थीं और उसकी आँखों में गहरी तल्लीनता थी| वह अपनी उमर के बाकी लड़कों के साथ गणित के मुश्किल सवाल हल करने में लगा हुआ था| शिक्षक की नज़र भी बाहर गई और वह मोरु की माँ की तरफ़ देख कर हल्के से मुस्कराए| मोरु फिर से स्कूल में था| इस बार वह बहुत कुछ सिख रहा था| और उससे भी बड़ी बात यह थी कि उसे पढ़ना-लिखना अच्छा लग रहा था|




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