लालची चूहे जी



एक दिन चूहे जी को एक बड़ा सा बन मिला| “मैं इस बन को घर ले जाऊँगा,” वह बोले|



उन्होंने बन को पीछे से खिसकाया| बन नहीं हिला|



उन्होंने आगे से खींचा| बन नहीं हिला|



दाएँ से धक्का दिया, बन नहीं हिला|



बन के पीछे से भागे और बाएँ से  धक्का दिया पर बन नहीं हिला|



हूँ ड ड… मैं इस पर रस्सी बाँधूंगा|  इसे खींच कर घर ले जाऊँगा|  चूहे जी दौड़ कर घर से रस्सी ले आये पर वो छोटी पड़ गई|



वह वापस गये और लंबी रस्सी लाये| बन को बाँधा और खींचा… और खींचा पर बन नहीं हिला|



चूहे जी बैठ गये और थोड़ा सा बन कुतरा|  वाह, क्या स्वाद था! थोड़ा और खाया, थोड़ा और,  और फिर थोड़ा और… बन छोटा होता गया|



अब बन को हलका सा धक्का दिया और वह सीधे लुढ़कता हुआ उनके घर के अन्दर! चूहे जी बड़े खुश| पूरा का पूरा बन सही सलामत उनके घर में था| पर उन्होंने इतना बन खाया था कि उनका पेट इतना… इतना… बड़ा हो गया|



चूहे जी ने ख़ुद को बड़ा धक्का लगाया पर अपने घर में नहीं घुस पाये|



अपने दरवाज़े के बाहर चूहे जी पेट पकड़ कर बैठ गये,  “इतना सारा बन नहीं खाना चाहिये था मुझे|  किसी के साथ बाँट लेता तो कितना अच्छा होता|”




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